क्या सोशल मीडिया हमें एंटी सोशल बना रही है (Is Social Media Making Us Anti-Social)

क्या सोशल मीडिया हमें एंटी सोशल बना रही है (Is Social Media Making Us Anti-Social)

क्या सोशल मीडिया हमें एंटी-सोशल बना देता है? ये कैसा सवाल हुआ? मतलब सोशल मीडिया हमें एंटी-सोशल कैसे बना सकता है? ये मुमकिन नहीं हो सकता, अगर आप भी यही सोचते हैं तो हम आपको कुछ बताना चाहतें हैं।

आपने कई लोगों को कहते सुना होगा कि दुनिया छोटी हो गई है और कई लोग तर्क भी करते हैं कि ये अब पहले के मुकाबले ज्याद तेज़ गति से भाग रही है। लोगों के पास समय का अभाव है। मिलने-झुलने का वक्त नहीं है। या दुसरे शब्दों में कहा जाए तो लोग अब कम मिलनसार हो रहें हैं।

एक वक्त हुआ करता था जब बच्चे विद्यालय से आकर सीधे खेलने के लिए जाते थे और दिन ढलने से पहले घर नहीं आते थे। एकत्रित होकर खेलना बच्चों कि निशानी हुआ करती थी। इतना ही नहीं बच्चों के खेल का आनंद बड़े-बुजुर्ग भी लिया करते थे। मगर आज कल ये सब कहीं खो सा गया है। खो-खो, कबड्डी कि जगह विडियोगेम्स ने ले ली है। बाहर निकलकर खेलने की बजाय बच्चे घर पर बैठकर मोबाइल चलाना ज्यादा पसंद करते हैं।

मित्रों से प्रत्यक्ष ना मिलकर अब लोग सोशल मीडिया के माध्यम से मिलना ज्यादा पसंद करते हैं। मित्र के साथ सांय काल की सैर के बजाय मोबाइल पर बात करना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। घर-परिवार में साथ में बैठकर वार्तालाप करने की जगह अब लोग एकांत में दूर बैठे मित्र से बात करना या फिर फैसबुक पर अंजान व्यक्तियों ने कौनसी तस्वीर डाली है पर ज्यादा दिलचस्पी दिखातें हैं। यहां तक कि एक ही घर में रहने वाले सदस्य अपने अपने कमरों में अकेले अपने मोबाइल लैपटॉप से तनहाई दूर करते हैं | बच्चे माता-पिता, दादा-दादी से अधिक सोशल मीडिया से प्यार करते हैं | तो एक सवाल ज़हन में अक्सर आ जाता है कि क्या सोशल मीडिया हमें एंटी-सोशल बना देता है?

सोशल मीडिया एक ऐसा मंच है जहां पर आप अपने विचार, भावनाएं, ज्ञान, और भी बहुत कुछ साझा कर सकते हैं। इसमें अप्रत्यक्ष रूप से आप बहुत से व्यक्तियों के साथ विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। मगर आजकल लोग इसके इतने आदी हो चुके हैं कि वह घंटो सोशल मीडिया साइट्स पर बिता देते हैं। उन्होने अपने आप को असल दुनिया से अलग कर लिया है और अपनी बनाई हुई नकली दुनिया में जीने लगे हैं। अब तो ऐसा भी होने लगा है कि आप होते तो एक व्यक्ति के साथ हो मगर फोन पर दूसरे व्यक्ति के साथ बात कर रहे होते हो। जिसके वजह से आप सामने वाले व्यक्ति की बातें ठीक से समझ नहीं पाते और कई बार महत्वूर्ण बातों का तवज्जो ना मिलने के कारण अब एक-दुसरे के दिल को ठेस भी पहुंचा देते हो।

एक सर्वेक्षण से पता चला है कि लोग प्रतिदिन 2 घंटे सोशल मीडिया साइट्स पर बिताते हैं। जहां एक तरफ़ सोशल मीडिया साइट्स ने हमें दूर बैठे दोस्तों और संबंधियों से जोड़ा है वहीं दुसरी और इन साइट्स ने हमें करीबी लोगों से दूर कर दिया है। शाम को बैठकर मित्रों से वार्तालाप  करना अब खत्म हो गया है। एक साथ खुशियों में शामिल भी लोग कम ही होतें हैं। एक-दूसरे के साथ जो रिश्ता प्रत्यक्ष रूप से जुड़ना चाहिए वह जुड़ नहीं पाता। और लोग भीड़ में अकेले होते जा रहें हैं। फैसबुक पर जन्मदिन की बधाई देनेवाले मित्र सैकडों है मगर बीमार होने पर हाल पूछ्ने वाला कोई नहीं। ऑल दी बैस्ट कहने वाले दर्जनों मित्र हैं मगर आपकी खुशियों में शामिल होने वाला कोई नहीं। तो हां, सोशल मीडिया हमें एंटी-सोशल बना देता है।

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I am 21 years old boy from Faridabad, India. I am a freelance writer, blogger, and part-time singer.

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